Tuesday, October 11, 2016

"आया अटरिया पे चोर"

शहर में चोरियां बढ़ रही हैं | दुकानों के ताले और शटर टूट रहे हैं |छत से लेकर बाथरूम तक सेंधमारी हो रही है |चोर इस कद्र सक्रिय हैं कि पलक झपकते ही माल पार कर लेते हैं जबकि पुलिस वाले इतने आरामतलब हैं कि उन्हें पलक झपकने में भी अलाली आती है |
कहते हैं चोर जो है चोरी छोड़ सकता है लेकिन हेराफेरी फिर भी नहीं छोड़ता |हेराफेरी उस पवित्र अनुष्ठान को कहते हैं जिसके अंतर्गत चोर जो है सतत इस बात की निगरानी करता है कि दरवाजे के कुंडे को किधर से तोडा जाये | या दीवार में जो खिड़की है उसकी चिटकनी कैसे उखड़ेगी |अथवा माकन मालिक ने जो गलियारा या पैसेज जैसा बनवाया है उसमे किधर से जम्प लगाया जाये कि सीधे उस जगह पर पहुँच जाएँ जिधर मेडम की गहनों वाली अलमारी रखी है | और यह भी कि दारी ने गहने अलमारी में रखे भी हैं या लाकर में रख आई है | हाँ भाई साब आजकल लोग बड़े चालाक हो गए हैं | बाहर से ऐसा दिखावा करते हैं कि कपाट में करोड़ों का माल भरा है और अन्दर देखो तो सेल कि बुसांदी साड़ियाँ और पालिस वाले झुमको के सिवा कुछ नहीं निकलता | लोगों की इसी बदमाशी के कारण चोर लोग बिलावजह हलाकान होते हैं | लेकिन क्या करें चोर जो है चोरी छोड़ सकता है हेराफेरी फिर भी नहीं छोड़ता |


कालोनी में सतत चोरियां हो रही हैं |चार दिन पहले मोहल्ले की एक दूकान में सेंधमारी हुई | आज पडोसी का ताला टूट गया | मैंने डरते हुए पत्नी से कहा अब अपना नम्बर है | श्रीमतीजी आदत और परम्परा के अनुसार असहमत होते हुए बोली - आप कैसे कह सकते हैं ! यह फैसला तो चोरों को करना है |फिर सहमती जताते हुए कहने लगी आपसे कितनी बार कहा कि आर्नामेंट्स बैंक के लाकर में रख आओ लेकिन सुनते ही नहीं | मै चोकन्ना हो गया |मुझे यह चोर चर्चा गृहयुद्ध की तरफ जाती दिखाई पड़ी | मैंने युद्ध विराम जैसा करते हुए कहा – नहीं मै तो यूँ ही कह रहा था |वैसे अपने घर में रखा भी क्या है और वाचमेन भी तो है अपनी कालोनी में |मैंने अपने को ढाढस जैसा बंधाया |हालाकि इस सच्चाई से कालोनी के सभी लोग वाकिफ हैं कि चोरी से बचने के लिए हमने वाचमेन के नाम पर जिस नेपाली गोरखे को नियुक्त किया हैवह सारी रात सिर्फ नींद से लड़ता है | और सुबह तीन चार बजे जब चोरी का पीक टाइम होता है तब नींद के हाथों परास्त होकर एक तयशुदा ओटले पर अपनी टोपी उतारकर धराशायी हो जाता है |नींद उसे इस कदर मीठी और गहरी आती है कि चोर लोग उसके कपडे भी उतार ले जाये तो वह जागने को तैयार नहीं होता | एक दफे ऐसा हो भी चुका है |उस रात कालोनी में दो जगह चोरियां हुई | सुबह गुस्से से भरे लोग जब वाचमेन की तलाश में निकले तो वह एक खंडित ओटले पर लगभग अर्धनग्न अवस्था में खड़ा था | उसके शरीर पर सिर्फ अंडरवीयर बचा था | हम लोग उसके सामने अपना रोना रोते उसके पहले वह हँसते हुए बोला – शाब जी ! शाब् जी ! कोई हमारा पतलून उतार ले गया |लोग उसकी हंसी का अर्थ आज तक नहीं समझ सके कि वह पतलून चुराने वालों की मूर्खता पर हंस रहा है या अपनी इस दीन दशा पर कि साला सरे आम चीरहरण हो गया | 
चोरी करने के लिए ऊंचा आत्मबल होना चाहिए | आत्मविश्वास जब तक कूट कूट कर नहीं भरा हो तब तक आदमी और कुछ भले ही कर ले चोरी नहीं कर सकता |चोरी करते हुए पकड़ा जाने पर जो कुटाई होती है वह आत्मविश्वास को बढ़ाती है | आत्मविश्वास एक ऐसा तत्व है जो चोरी करने से लेकर एवरेस्ट पर चढने तक में काम आता है | मैं अपने बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरा आत्मबल बहुत कमजोर है | मुझे रात में किसी की डोरबेल बजाने में भी डर लगता है जबकि चोर लोग डोरबेल की तो छोडिये पूरा शीशम का दरवाजा उखाड़ ले जाते हैं | 
इधर निमाड़ और मालवा में चोरों का एक ऐसा गिरोह सक्रिय है जो चड्डी बनियान गिरोह कहलाता है | ये बिचारे इतने विनम्र और निष्ठावान चोर हैं जो अपनी वेशभूषा तक की परवाह नहीं करते और चोरी के कर्म को बहुत समर्पण भाव से सम्पन्न करते हैं |हालाकि चोरों के पास भगवान् का दिया इतना होता है कि वे चाहें तो सूट पहनकर चोरी करें | लेकिन जब चड्डी बनियान के बल पर ही एक समूचे घर का सूपड़ा साफ़ हो सकता है तो फिर सूट की क्या जरूरत | कर्म के प्रति निष्ठावान लोग कपड़ों की तरफ कम ही ध्यान देते हैं | ऐसा नहीं है कि चोरी केवल चड्डी पहनकर ही होती है सूट और कलफदार कुरते पहनकर भी लोग चोरियां करते हैं | लेकिन यह चोरी दूसरे किस्म की होती है | इस चोरी में आदर्शों और सिद्धांतो की आड़ ली जाती है | लोकतंत्र में ऐसी चोरी जनसेवा कहलाती है |
चोरियों के बाबत यह भी सुनने में आया है कि जिस इलाके में पुलिस कि गश्त ज्यादा होती है वहां चोरियां खूब होती है | लोग कहते हैं यह मिलीभगत वाला मामला है | मैं इसे सिरे से नकारता हूँ | ऐसी बातों से पुलिस का मनोबल गिरता है| चोरी चकारी जैसी बातों से पुलिस का मनोबल नहीं गिराना चाहिए | वैसे भी आजकल पुलिस वालों को सैकड़ों काम है | आतंकवादी रेलगाड़ियों में बम रख रहे हैं पुलिस वाले उनको पकड़ें या आपकी जेब में पड़ी चवन्नी की हिफाजत करते फिरें | बल्कि देखा जाये तो आपकी जेब में चवन्नी भी नहीं है | पुलिस वालों को सब पता रहता है भाई साब | यात्रा में चोरी होना आम बात है | प्राचीन काल में लोग गठरी लेकर यात्रा करते थे | कबीर ने कहा है “ तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर “ | जैसा कि सभी जानते हैं कि गठरी में काफी मालमत्ता हुआ करता था लिहाजा चोर लोग इस गठरी के पीछे लग जाते थे |आजकल गठरी के बजाये सूटकेश का चलन है इसलिए सूटकेश चुराए जाते हैं | दिल चुराने वाले सिर्फ दिल ही चुराते हैं तथा दीगर वस्तुओं की तरफ ध्यान नहीं देते | दिल चुराने के उपरांत ये सामने वाले को तो बैचेन करते ही हैं खुद भी काफी परेशान रहते हैं | दिल का मामला ख़राब होता है | दिल चुराते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस कन्या का दिल चुराया जा रहा है उसका बाप पहलवान या थानेदार इत्यादि न हो | वर्ना ऐसे मामलों में दिल तो अलग रह जाता है और जूते इस कदर पड़ते हैं कि तबियत हरी झक्क हो जाती है | जो लोग किडनी चुराते हैं वे डॉक्टर कहलाते हैं | किडनी चुराने वाले डॉक्टर देखा जाये तो बहुत अव्वल दर्जे की मानव सेवा करते हैं | यार आपको परमात्मा ने दो दो किडनियाँ दे रखी हैं जबकि आपका काम एक ही किडनी से चल जाता है | ऐसे में कोई डॉक्टर बिचारा एक किडनी निकाल कर सामने वाले को लगा देता है तो क्या गलत करता है | भाई साब आप दो दो किडनियों का अचार डालोगे क्या | जबकि किडनी का तो कमबख्त अचार भी नहीं डलता | 
पिछले दिनों एक ऐसी वारदात हुई जिसमे चोरों ने चोरी के पहले किचेन में घुसकर कूकर चढ़ाया दाल चावल बनाये और तृप्त होकर भोजन किया तथा उसके बाद चोरी के पुनीत कार्य को सम्पन्न किया |घरवाले चूँकि दुसरे शहर में शादी में गए थे इसलिए चोरों ने पूरी स्वतंत्रता से प्रीतिभोज निपटाया | ठीक भी है | भाई साब आप पराये शहर में जाकर डिनर उड़ायें और चोर लोग बिचारे भूखे पेट चोरी करें यह एक समतावादी देश में कैसे हो सकता है | एक फ़िल्मी गाने कहा है कि चाँद चुराकर लाया हूँ चल बैठे चर्च के पीछे | इस गाने से चोरों को यह प्रेरणा मिलती है कि जब भी चाँद आदि चुराया जाये तत्काल चर्च के पीछे चले जाना चाहिये | चर्च के पीछे जाकर आप चाहें तो ईश्वर से अपने गुनाहों कि माफ़ी मांग सकते हैं और लगे हाथ चोरी के माल का बंटवारा भी कर सकते हैं | इसी को सुधी जन एक पंथ दो काज कहते हैं | चाँद का चोरी से कुछ परम्परागत रिश्ता नजर आता है | एक हाइकू में कहा है 
आकाश में पूर्णिमा का 
खूबसूरत चाँद देखकर 
चोर का मन गाने को मचल उठा | इस हाइकू कि कवयित्री का नाम बुशन है | जो लोग छोटी चोरियां तथा चोरी के दौरान ओछी हरकतें करते हैं उन्हें उत्कृष्ट चोरों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता | चोरी की दुनिया में वर्षों से सक्रिय एक नामी और वरिष्ठ चोर ने बताया कि आजकल इस धंधे में कुछ गलत लोग आ गए हैं जो महिलाओं के गले से चैन झपटते हैं | ऐसे लोगों ने इस धंधे को बदनाम कर दिया है | चोर दादा ने बताया कि वे जब तक इस धंधे में रहे उन्होंने किसी महिला को हाथ भी नहीं लगाया | जबकि अलमारी में रखे उस के गहने पूरी तरह साफ़ कर दिए | चोर दादा ने कहा कि उसने बैंक के लाकर से लेकर रेल के वैगन तक तोड़े पर किसी का गला नहीं काटा | आखिर चोरी के भी कुछ उसूल होते हैं भाई साब | मैंने कहा दादा आजकल क्या कर रहे हो | वह बोला अब तो समाज सेवा ही बची है वही कर रहे हैं | इस धंधे में भी मजा आ रहा है | आगे देखते हैं किसी अच्छी पार्टी का टिकिट मिला तो चुनाव लड़ लेंगे | कि गलत कह रहा हूँ |

"अतिक्रमण की आचार संहिता"

गुरु ने समझाया !
अतिक्रमण एक दम से नहीं होता ,धीरे धीरे होता है |वो कहते हैं न , माली सींचे सौ गुना ऋतु आये फल होय | अर्थात माली  कितना भी पानी सींचबे  करे फल तो ससुरा  ऋतू आने पर ही होता है | समझे कि नहीं समझे | अतिक्रमण के लिए बबुआ पहले जमीन तैयार करनी पड़ती है | ये नहीं कि सुबह आँख मलते मलत उठे और जाकर बीच बाजार में गुमटी ठोंक दी | ये अतिक्रमण नहीं है ये तो सरकारी जमीन पर अत्याचार  है | ऐसे में तो पुलिस वाला  पहले गुमटी की  और उसके बाद गुमटी ठोकवे वाले की  क्या दुर्गाति करेगा इसकी भविष्यवाणी पुलिस का आई जी भी नहीं कर सकता | तो हम किस खेत की मूली हैं |
अतिक्रमण के कुछ सिद्धांत होते हैं | गुरु ने लम्बी साँस खींची  जैसे सिद्धपुरुष गाँजे की  चिलम खींचते हैं | पहली बात तो यह कि अतिक्रमण के लिए मनोबल होना  चाहिए |  जीवन में मनोबल बहुत आवश्यक है | मनोबल का  ऐसा है कि वह साला एवरेस्ट पर चढ़ने से लेकर चोरी चकारी  करने तक सब में लगता है | जिस मनोबल से आदमी मिनिस्टर बनता है उसी मनोबल से वह डकैती भी डाल सकता है | मनोबल एक ही तरह का  होता है , लेकिन अतिक्रमण के अनेक प्रकार हैं | एक होता है घरेलू अतिक्रमण | जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है , यह घर से शुरू होता है | मै तो  कहता हूँ बच्चों में अतिक्रमण के संस्कार बचपन से ही डाल देना चाहिए | जैसे  आरम्भ में बच्चों से कहो कि वे ओटला बनाना सीखें | ओटला अतिक्रमण का प्राईमर है | घर के सामने सरकारी जमीन पर बना हुआ ओटला आगे चलकर घरेलु बगीचे की आधारशिला बनता है | एक बार ओटला बन जाये तो बिटिया से कहो  कि वह  उस पर राँगोली डालना शुरू करे | क्या कहा बिटिया नहीं है ! यही तो मुश्किल है आप लोगों के साथ , बेटी को पैदा ही नहीं होने देते | गर्भ में ही उसका तीया पांचा  कर डालते हैं | घोर कलियुग है भाई साब | खैर कोई बात नहीं राँगोली तो आप भी डाल सकते हैं | उसमे कौन सी नाक कट रही है | वैसे भी कालोनी में आपकी कितनी इज्जत है सबको पता है | खैर  यहाँ राँगोली या  इज्जत  का  मसला नहीं है असली चीज ओटला है | एक बार ओटला बन जाये फिर उस पर नियमित राँगोली डालते रहो | धीरे धीरे राँगोली भी आपकी ओटला भी  आपका और ओटले के नीचे की  शस्य श्यामला सरकारी भूमि भी आपकी | फिर राँगोली डालो या अमरुद का बिरवा रोप दो  किसी की  मजाल   कि  उंगली उठा दे | ये हुआ घरेलु अतिक्रमण | जब घरेलु अतिक्रमण के संस्कार पुख्ता हो जाते हैं तो आदमी बाजार में अतिक्रमण  के बारे में सोचना शुरू कर देता है |  बाजार मे अतिक्रमण की कला को कामर्शियल अतिक्रमण कहते हैं | कमर्शियल अतिक्रमण का ऐसा है कि बस एक गुमटी उठाओ और आधी रात को कोई अच्छा  सा मुहूर्त देख कर बीच बाजार में ठोंक दो | ध्यान रहे कि गुमटी किसी नाली या गटर के किनारे पर ही ठोकना चाहिए और इस बात की फ़िक्र नहीं करना कि तुम्हारे इस किये धरे से नाली या गटर रुक जाएगी | अरे राम भजो  भैया |पानी का तो स्वभाव ही बहना है | तुम इधर रोकोगे तो वह दूसरी दिशा पकड लेगा | ज्यादा ही हुआ तो सड़क पर  बहने लगेगा | दस्तूर यह है कि अतिक्रमण वाले को नाली या गटर जैसी तुच्छ चीजों की चिंता नहीं करनी चाहिए | हाँ इस बात की परवाह जरुर करो कि चौरस्ते पर जो पुलिस का जवान खड़ा है वह नई गुमटी देखकर आश्चर्य चकित  हो उसके पहले उसे  बढ़िया पीवर दूध की चाय और जाफरानी वाला पान पेश कर दो | तथा लगे हाथ हें हें करते हुए ऐसी सूरत का मुजाहिरा करो कि आप अभी अभी पच्चीस जूते खाकर आये हैं | पुलिस वाले को झक मारकर  पिघलना पड़ेगा | बस हो गया अतिक्रमण |
   लेकिन इस तरह नाली या  गटर रोकने से ड्रेनेज सिस्टम बर्बाद हो जायेगा | शहर में बाढ़ के हालात बनेगे और निर्दोष लोगों की फजीहत नहीं  होगी | एक जिज्ञासु ने शंका प्रगट की |

गुरु बोले  यार ये महात्मा गिरी करनी है तो फिर अतिक्रमण के धंधे में क्यों आना चाहते हो | इससे तो बेहतर है कहीं स्कूल विस्कूल खोल लो |   

"दाल पर उच्चस्तरीय बैठक"

दिल्ली में दाल को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक हो रही है ।चैनलों पर दिखाया जा रहा है ।खादीके झक्क सफ़ेद कुरतों और काली जैकेटों के बीच एक कम्पटीशन जैसा मचा है ।बैठक वालों के चेहरों पर इतनी गहन चिंता और तल्लीनता जैसी नजर आ रही है कि लगता है दाल के पौधे इसी क्षण संगमरमर का फर्श फोड़कर ऊग पड़ेंगे । चिंता जरूरी है ।बैठकों का यही दस्तूर है ।उच्चस्तरीय बैठक वालों का स्तर  ऊंचा होता है । फिदिल्ली में दाल को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक हो रही है ।चैनलों पर दिखाया जा रहा है ।खादीके झक्क सफ़ेद कुरतों और काली जैकेटों के बीच एक कम्पटीशन जैसा मचा है । बैठक वालों के चेहरों पर इतनी गहन चिंता और तल्लीनता जैसी नजर आ रही है कि लगता है दाल के  पौधे इसी क्षण संगमरमर का फर्श फोड़कर ऊग पड़ेंगे। चिंता जरूरी है। बैठकों का यही दस्तूर है ।उच्चस्तरीय बैठक वालों का स्तर  ऊंचा होता है । फिर उनके बीच चर्चा का स्तर जो भी हो उससे फर्क नहीं पड़ता ।अव्वल तो दाल जैसी सर्वहारा चीज पर बैठक हो जाये यही बहुत है ।

बैठक का एक सीधा सा मतलब  यह भी होता है कि बैठे रहो जहाँ बिठाया जा रहा है ।और तब तक मत उठो जब तक कमर या शरीर के दीगर हिस्से अकड़ न जाएँ। बैठक का उसूल ही यह है कि वह लंबी चले । वो कहते हैं न कि- " बैठे रहें तसव्वुर ए जाना किये हुए  ।अब आप ये मत कहिये कि इस उच्चस्तरीय बैठक में ये तसव्वुर ए जाना क्यों घुसा रहे हैं ।देखिये तसव्वुर ए जाना का ऐसा है कि राजनीति में तसव्वुर अर्थात कल्पना इसी बात की होती है कि माल किधर है और उसे लपकने का क्या इंतेजाम है। यहाँ बैठकें होती ही इसलिए हैं कि इस किस्म की तसव्वुरातों को हकीकत में बदला जा सके ।रही बात दाल की तो दाल में काला  सिर्फ यह है कि  देशी दाल को विदेशों से  आयात  किया जा रहा है और मजे की बात यह है कि इस देश में सात करोड़ किसान हैं तथा लाखों एकड़ कृषि भूमि है ,जो सोना चाहे न भी उगलती हो दाल तो ऊगा ही सकती है । मेरे पापी मन में यह शंका बार बार उठ रही है कि इस देश के किसानों से भी एक बार पूछ लिया होता कि भाई लोगों आप अरहर चना आदि क्यों नहीं उगाते । लेकिन क्या करें बैठक चूँकि उच्चस्तरीय है और यहाँ के  किसानो का  स्तर तो आपको  पता ही है भाई साब। बहरहाल । इधर दाल ने इस सदी के सबसे ऊंचे दामो पर बिक कर न केवल दलहन बिकवाली के सारे रिकार्ड तोड़ डाले वरन किस्से और किवदंतियों को भी उलट दिया घर की जिस  मुर्गी को दाल बराबर कहा जाता था वह दाल के सामने बांग देने लायक भी नहीं बची। जबकि पक्षियों  के जानकार  कहते हैं कि  बांग केवल मुर्गे देते हैं और मुर्गीयां उनकी बांगो को सुनकर सुबह जागने का कार्य सम्पन्न करती हैं । जो भी हो राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि चीजों के दाम जब हद से ज्यादा बढ़ने लगे तो इस तरह की उच्चस्तरीय बैठक करना जरूरी हो जाता है । सारे देश के शाकाहारी दाल की बढ़ती कीमतों से दुखी हैं। उनके दालभात में कोई मूसलचंद आकर बैठ गया है जो फ़िलहाल इन बैठकों  से हटने वाला नहीं है ।अलबत्ता खुद की बात कहूँ तो अपनी दास्तान ए दाल फ़क़त इतनी है कि इधर निमाड़ में दाल की फसल आते ही हम लोग एक कट्टा दाल हर बार मिल से खरीद लेते हैं। इस बार भी खरीद ली थी जो उस वक्त 50 - 60 रपये किलो के हिसाब से मिल गयी । एक कट्टे में अमूमन 30- 35 किलो दाल आ जाती है ।जबकि हमारा काम मात्र 20 किला से ही चल जाता है ।लेकिन कट्टा लेना मजबूरी है ,मिल वाले लूज नहीं बेचते । जिन लोगों को कट्टे के बारे में संदेह है उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि इस कट्टे का देशी पिस्तौल से कोई सम्बन्ध नहीं है। हलाकि इधर कई इलाकों में देशी कट्टे बनाने का गृहउद्योग भी  तेजी से पनप रहा है जो कि ठीक ही है ।देशी कट्टे वाले भी अंततः इस पापी पेट के लिए दालरोटी के इंतेजाम में ही लगे हैं ।दाल रोटी की चिंता न हो तो आदमी ऐसे जोखिम भरे काम में हाथ क्यों डाले । खैर कल शाम पत्नी ने दाल को लेकर एक ऐसा मुद्दा उपस्थित कर दिया जो यदि संसद में उठा दिया जाये तो सरकार कट्टा खरीदने पर प्रतिबन्ध लगा दे। पत्नी ने प्रसन्नचित्त होते हुए कहा कि अगली बार भी एक कट्टा दाल खरीद लाना । मैंने कहा दाल खत्म हो गयी क्या। वे बोलीं नहीं ,बगल वाली मिसेज वर्मा को जरूरत थी सो मैंने 200 रूपये किलो  की दर से 10 किलो बेच दी। एक किलो पीछे 150 रूपये बच गए ।इतना कहकर वह दाल का कूकर रखने चली गयी और मैं जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग के इस नितांत घरेलु संस्करण पर अभी भी सोच रहा हूँ  ।र उनके बीच चर्चा का स्तर जो भी हो उससे फर्क नहीं पड़ता ।अव्वल तो दाल जैसी सर्वहारा चीज पर बैठक हो जाये यही बहुत है । बैठक का एक सीधा सा मतलब  यह भी होता है कि बैठे रहो जहाँ बिठाया जा रहा है ।और तब तक मत उठो जब तक कमर या शरीर के दीगर हिस्से अकड़ न जाएँ ।बैठक का उसूल ही यह है कि वह लंबी चले । वो कहते हैं न कि -" बैठे रहें तसव्वुर ए जाना किये हुए  ।अब आप ये मत कहिये कि इस उच्चस्तरीय बैठक में ये तसव्वुर ए जाना क्यों घुसा रहे हैं ।देखिये तसव्वुर ए जाना का ऐसा है कि राजनीति में तसव्वुर अर्थात कल्पना इसी बात की होती है कि माल किधर है और उसे लपकने का क्या इंतेजाम है ।  यहाँ बैठकें होती ही इसलिए हैं कि इस किस्म की तसव्वुरातों को हकीकत में बदला जा सके ।रही बात दाल की तो दाल में काला  सिर्फ यह है कि  देशी दाल को विदेशों से  आयात  किया जा रहा है और मजे की बात यह है कि इस देश में सात करोड़ किसान हैं तथा लाखों एकड़ कृषि भूमि है ,जो सोना चाहे न भी उगलती हो दाल तो ऊगा ही सकती है ।मेरे पापी मन में यह शंका बार बार उठ रही है कि इस देश के किसानों से भी एक बार पूछ लिया होता कि भाई लोगों आप अरहर चना आदि क्यों नहीं उगाते । लेकिन क्या करें बैठक चूँकि उच्चस्तरीय है और यहाँ के  किसानो का  स्तर तो आपको  पता ही है भाई साब । बहरहाल। इधर दाल ने इस सदी के सबसे ऊंचे दामो पर बिक कर न केवल दलहन बिकवाली के सारे रिकार्ड तोड़ डाले वरन किस्से और किवदंतियों को भी उलट दिया घर की जिस  मुर्गी को दाल बराबर कहा जाता था वह दाल के सामने बांग देने लायक भी नहीं बची। जबकि पक्षियों  के जानकार  कहते हैं कि  बांग केवल मुर्गे देते हैं और मुर्गीयां उनकी बांगो को सुनकर सुबह जागने का कार्य सम्पन्न करती हैं । जो भी हो राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि चीजों के दाम जब हद से ज्यादा बढ़ने लगे तो इस तरह की उच्चस्तरीय बैठक करना जरूरी हो जाता है । सारे देश के शाकाहारी दाल की बढ़ती कीमतों से दुखी हैं ।उनके दालभात में कोई मूसलचंद आकर बैठ गया है जो फ़िलहाल इन बैठकों  से हटने वाला नहीं है ।अलबत्ता खुद की बात कहूँ तो अपनी दास्तान ए दाल फ़क़त इतनी है कि इधर निमाड़ में दाल की फसल आते ही हम लोग एक कट्टा दाल हर बार मिल से खरीद लेते हैं। इस बार भी खरीद ली थी जो उस वक्त 50 - 60 रपये किलो के हिसाब से मिल गयी । एक कट्टे में अमूमन 30- 35 किलो दाल आ जाती है ।जबकि हमारा काम मात्र 20 किला से ही चल जाता है ।लेकिन कट्टा लेना मजबूरी है ,मिल वाले लूज नहीं बेचते ।जिन लोगों को कट्टे के बारे में संदेह है उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि इस कट्टे का देशी पिस्तौल से कोई सम्बन्ध नहीं है ।हलाकि इधर कई इलाकों में देशी कट्टे बनाने का गृहउद्योग भी  तेजी से पनप रहा है जो कि ठीक ही है  ।देशी कट्टे वाले भी अंततः इस पापी पेट के लिए दालरोटी के इंतेजाम में ही लगे हैं। दाल रोटी की चिंता न हो तो आदमी ऐसे जोखिम भरे काम में हाथ क्यों डाले । खैर कल शाम पत्नी ने दाल को लेकर एक ऐसा मुद्दा उपस्थित कर दिया जो यदि संसद में उठा दिया जाये तो सरकार कट्टा खरीदने पर प्रतिबन्ध लगा दे । पत्नी ने प्रसन्नचित्त होते हुए कहा कि अगली बार भी एक कट्टा दाल खरीद लाना । मैंने कहा दाल खत्म हो गयी क्या । वे बोलीं नहीं ,बगल वाली मिसेज वर्मा को जरूरत थी सो मैंने 200 रूपये किलो  की दर से 10 किलो बेच दी  ।एक किलो पीछे 150 रूपये बच गए ।इतना कहकर वह दाल का कूकर रखने चली गयी और मैं जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग के इस नितांत घरेलु संस्करण पर अभी भी सोच रहा हूँ  ।

"माटी कहे कुम्हार से"

कबीरदास कहते हैं कि एक बार मिटटी ने कुम्हार से निवेदन किया कि तू मुझे मत रौंदे | क्योंकि हो सकता है अगले चुनाव के बाद तेरे सितारे गर्दिश में आ जाएँ और मैं तुझे इससे भी ज्यादा बुरी तरह रौंदू लिहाजा इस आपसी लड़ाई में न तेरा फायदा होगा ना मेरा | इससे तो बेहतर है तु मुझे किसी सरकारी विभाग को सौंप दे | आजकल सरकार को मिटटी कचरे की बहूत जरुरत है | मिटटी की बात सुनकर कुम्हार ने अपना चलता हुआ चाक रोक दिया तथा उसकी इस नेक सलाह पर गंभीरता से विचार करने लगा | आदमी जब भी गंभीरता से विचार करता है तो उसका ध्यान हमेशा उस दिशा की तरफ जाता है जिधर से दो पैसे की आमदनी की हो | अंततः कुम्हार ने सारी मिटटी म प्र की सरकार को सौंप और वह जिला कुम्भकार परिषद् का चेयरमेन बन गया | कहते हैं यह बाढ़ पीड़ितों के राशन के गेहूं में जो मिटटी आ रही है यह वही कबीरदास वाली मिटटी है | बाढ़ पीड़ित चिल्ला रहे हैं कि पचास किलो की बोरी में बीस किलो मिटटी दी जा रही है | सरकार को विधानसभा में शर्मिंदा होना पड़ रहा है|
सरकार के एक प्रवक्ता का कहना है कि बाढ़ पीड़ित नाहक चिल्ला रहे हैं | सररकार को शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है | मिटटी भी कोई शरमाने की चीज है | सरकार जब बड़े बड़े घोटालों से नहीं शरमाई तो ये गेहूं में मिली मिटटी की क्या हैसियत है जो सरकार को शरमाने पर मजबूर करे | और सबसे बड़ी बात तो यह कि ये राशन के गेहूं इसी मिटटी मे पैदा हुए हैं ,लिहाजा वक्त पड़ने पर यही मिटटी तो मिलाई जाएगी भाईसाब | सिविल सप्लाई वालों ने कोई विदेश से मिटटी लाकर तो नहीं मिला दी गेहूं में | अपने देश की मिटटी पर भी आप लोग गर्व नहीं करोगे तो हो चुकी राष्ट्र भक्ति | फिर राष्ट्रवाद और स्वदेशी का संक्ल्प तो सरकार के घोषणा पात्र में भी पहले से ही है | आपको तो गर्व करना चाहिए कि गेहूं के साथ मिटटी मुफ्त में मिल रही है | वर्ना पिछली सरकारों ने तो राशन के गेहूँ के साथ घुन भी बेच दिया था जो गेहूं को पोला कर देता है | आपको जानकर ख़ुशी होगी कि हमने गेहूं के घुन को समाप्त कर दिया है | हम मिटटी लेकर आये हैं | कायदे से तो इस मिटटी से आप लोगों को तिलक करना चाहिए क्योंकि ये धरती बलिदान की है | स्वतंत्रता दिवस सामने है और आपलोग देश भक्ति की तरफ पीठ करके मिटटी मिटटी कर रहे हो | आखिर देश के प्रति आपका कोई कर्त्तव्य है कि नहीं | आयं |
प्रवक्ता ने सफाई देते हुए कहा कि गेहूं में मिटटी इसलिए मिलाइ जा रही है कि लोगों को मिटटी खाने की आदत पड़े | हो सकता है कल को अकाल पड़ जाये और खेतों में फसल ही न हो तो कम से कम मिटटी खाकर तो आदमी बचा रहेगा | अगर सभी भूख से मर गए तो अगले चुनाव में वोट कौन डालेगा | हमें तो प्रजातंत्र की भी रक्षा करनी है | इस देश के आदमी का कोई भरोसा नही रहा भाई साब | हमारा प्रजातंत्र तो मिटटी के भरोसे है | आप लोग गेहूं में मिटटी मिलाने पर चिंतित हो रहे हैं और हमें साहित्य और संस्क्रति की चिंता सता रही है देश का सारा साहित्य ससुरा धूल और मिटटी से भरा पड़ा है साब | बाबा सूरदास कह गए हैं कि” धुरि भरे अति शोभित श्यामजू “ अर्थात हमारे भगवान भी धूल और मिटटी में खेलते हुए ही शोभायमान लगते थे |
मैं पूछता हूँ क्या खराबी है इस मिटटी में | विशेषग्य कहते हैं कि इसमें कैल्शियम से लेकर पोटेशियम तक सारे खानिज भरे पड़े हैं | लोहे और ताम्बे के गुण भी इसी मिटटी में मौजूद हैं | और क्या चाहिए ये ही गुण तो आगे चलकर गेहूं में मिल जाते हैं | गेहूं खाओ या मिटटी खाओ एक ही बात है | इस बात पर तो सिविल सप्लाई वालों का सम्मान होना चाहिये जिन्होंने गेहूं और मिटटी के भेद को समाप्त कर दिया | जैसे आत्मा और ब्रह्म एक है वैसे गेहूं और मिटटी भी अलग नहीं है | आज देश में जरूरत इस बात की है कि अलगाव वादी प्रव्रत्तियों का खात्मा हो और राष्ट्रीय एकता की बात हो | मैं देश वासियों का आह्वान करता हूँ कि ये मिटटी और गेहूं के चोंचलों को समाप्त करके विश्वास का वातावारण बनायें | शिवमंगल सिहं सुमन कहते हैं “ मिटटी गल जाती पर उसका विश्वास अमर हो जाता है “ बोलो भारत माता की जय |

"कालाधन,रामधन ,श्यामधन इत्यादि"

कालेधन वालों से कहा जा रहा है कि वे स्वेच्छा से अपने कालेधन को उजागर कर दें ।वित्तमंत्री ने ३० सितम्बर की तारीख भी सुनिश्चित कर दी है |सितम्बर नजदीक आ रहा है | लोगों में उहापोह मची है ।क्या करें , उजागर करें कि पड़ा रहने दें ।इत्ते दिन से भी तो पड़ा है ,आज तक तो कुछ हुआ नहीं । जिनके पास कालाधन या किसी भी प्रकार का धन नहीं है वे प्रसन्न हो रहे हैं कि चलो अपने को कुछ नहीं करना ।जब है ही नहीं तो क्या करना है ।
मेरे पड़ोस में रामधन जी रहते हैं मैंने एक दिन उनसे पूछा कि तुम्हारे पास काला धन वगैरह तो नहीं है ! ,हो तो जाकर आयकर वालों को बता दो नहीं तो बाद में लेने के देने पड़ जायेंगे ।वे बोले भैया सरकारी मामला है इसलिए , लेने की तो छोडो देने ही पड़ेंगे | लेकिन अपने पास सिर्फ संतोष धन है जो सरकार के किसी काम का नहीं है | इसकी खासियत यह है कि इसके मिलने पर सारे धन धूल समान हो जाते हैं ।कहते हैं न " जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान "|इतना कहकर वे हँस दिए | संतों जैसी निर्लिप्त हँसी | मैंने कहा यह भी खूब कही ।


कालेधन को श्यामधन भी कह सकते हैं ।पर शुद्ध हिंदी में यह ब्लैकमनी ही कहलाता है ।जिनके पास ब्लैकमनी होती है उनके चेहरे पर दिव्य मुस्कान रहती है ।एक प्रकार की आध्यत्मिक दिव्यता ।" आठों पहर मस्तान माता " लेकिन इस मुस्कान पर ग्रहण लगने की खबर है ।सर पर संकट का पहाड़ मंडरा रहा है ।द्वापर में संकट के समय भगवान ने गोवर्धन उठाकर जनमानस को इंद्र के प्रकोप से बचा लिया था ।ब्लैकमनी वाले आज ऐसे ही गोवर्धन की तलाश में हैं । सितम्बर सामने है और मन की तिजोरी का ताला कंपकपाने लगा है।
लेकिन मेरे पापी मन में एक विचार बार बार खटक रहा है कि सरकार ने कालेधन वालों को सितम्बर तक की मोहलत भी क्यों दी ।इस नेक काम में इतनी देरी क्यों ।मैंने फिर , रामधन जी से ही पूछा ।मैंने कहा यार सरकार लेटलतीफी क्यों कर रही है ।तुरत दान महा काल्याण वाला फार्मूला क्यों नहीं अपनाती ।वे बोले भैया कालेधन वाले हमारे जैसे टटपूंजीये नहीं होते कि चाहे जब चप्पल चटकाते हुए पोटली लेकर इनकमटैक्स ऑफिस पहुँच जाएँ कि लो भैया ये रहा कालाधन कर लो जो करना है । ऐसा थोड़े ही होगा ।कालाधन उजागर करने का भी विधि विधान है भाईसाब ।समय लगता है उसमे ।पंडित जी को पूछकर दिशा मुहूर्त भी निकालना पड़ सकता है ।कि किस दिशा और किस मुहूर्त में इस ब्लैक मनी को उजागर किया जाये |जब कालेधन को इकट्ठा करने का शास्त्रों में विधान है तो उजागर करने का भी होगा ।यहाँ हर कोई विजय माल्या थोडे है कि उठे और प्लेन पकड़कर निकल लिए ।इतना कहकर रामधन जी खड़ताल बजाकर गाने लगे " पायो जी मैंने रामरतन धन पायो " मैंने कहा ये रामरतनधन क्या है ।वे बोले इसके लिए मीराबाई की तरह घर बार छोड़ना पड़ता है।मैंने सोचा इस देश में कितनी तरह के धन धान्य हैं ।तभी तो इस देश को सोने की चिड़िया कहा जाता है ।

"आलकी की पालकी जय कन्हैया लाल की"

इस बार मुख्यमंत्री पन्ना की बाढ़ देखने गए थे ।इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले बताते हैं कि वे राहत और बचाव के लिए गए थे ।जो भी हो यह मुख्यमंत्री और मीडिया का आपसी मामला है ।मुझे शक है ,मीडिया अभी इतना अंतर्यामी नहीं हुआ कि लोगों के मन की बात ताड़ ले ।लोगों को आज तक प्रधानमंत्री के मन की बात समझ में नहीं आयी ।खैर ,इन दिनों पूरे प्रदेश में बाढ़ आई हुई है ।आदमी जहाँ चाहे वहां बाढ़ देखने जा सकता है ।इस देश में बाढ़ देखने की पुरानी परंपरा है ।बच्चे बाढ़ देखने को मचलते रहते हैं ।शहरी मध्यम वर्गीय मम्मियां जो बाढ़ की आपदा से बची हुई हैं वे बच्चों को समझाती हैं ।चिंटू शैतानी मत करो शाम को पापा के साथ बाढ़ देखने चलेंगे ।नेतागण हेलीकाफ्टर से बाढ़ देखते हैं जबकि बाढ़ में फंसे हुए लोग नीचे से नेता का हेलीकाफ्टर देखते हैं ।बाढ़ कुछ नहीं है ।हेलीकाफ्टर और जनता के बीच देखा देखी का खेल है ।बाढ़ उतर जाती है तो नेता का हेलीकाफ्टर भी उतर आता है ।बाढ़ दो दिन का मेला है ।बाढ़ के बाद आदमी फिर से अकेला हो जाता है और बची हुई गृहस्थी को छत पर सुखाने लगता है ।
लेकिन बात मुख्यमंत्री की हो रही है ।मुख्यमंत्री होने के यही फायदे हैं ।जहाँ मन करे वहां बाढ़ देखने चले जाओ ।ऊपर से देखना है तो हवाईजहाज है ।नीचे से देखना है तो सारी जमींन अपनी है ।सबै भूमि गोपाल की । बाढ़ वाली नदी में घुस जाओ आपका बाल भी बाँका नहीं होगा ।व्यवस्था होमगार्ड की शक्ल में तैयार खड़ी मिलती है ।आप पैंया पैंया भी चलना चाहें तो सुरक्षा के हाथ पालकी बन जाते हैं ।मुख्यमंत्री होने में फायदे ही फायदे हैं ।लोग बताते हैं कि मुख्यमंत्री संवेदनशील हैं ।मुख्यमंत्री को होना पड़ता है ।वरना कल को लोग कहेंगे कि आदमी मुख्यमंत्री होकर भी संवेदनशील नहीं है ।तुलना होने लगेगी ।वो फलाने मुख्यमंत्री को देखो जनता दुखी हुई कि एकदम फटाकदिनी से रो पड़ते हैं ।
मुख्यमंत्री होने की यही विशेष ताएं हैं आजकल ।एक तो वह संवेदनशील हो और जमीन से जुड़ा हो ।बल्कि जमीन से यदि सही तरीके से जुड़ जाये तो आदमी आटोमेटिक संवेदनशील हो जाता है ।कुशल राजनीतिज्ञ जमीन से जुड़ने के मामले में पारंगत होते हैं ।जहाँ कहीं थोड़ी सी मिटटी दिखी कि फट से नमन कर लेते हैं ।फिर उसी मिटटी को राशन के गेहूं में मिलाकर लोगों को बाँट देते हैं ।लो भैया जमीन से भी जुड़ गए और दो पैसे की आमदनी भी हो गई ।दलितों के घर जमीन पर बैठना और भोजन करना तो इन दिनों फैशन में है कोई दलित यदि खटिया का इंतेजाम कर ले तब भी नेता लोग जमीन पर ही बैठते हैं ।नेताओं का यह जमीन प्रेम इतना बढ़ गया है कि चुनाव के बाद वे दलितों की जमीन तक हड़प लेते हैं ।सुधि जन जानते ही हैं कि प्रेम में आदमी अँधा हो जाता है ,फिर जमीन के प्रेम में तो लोग अंधे के अलावा बहरे भी होने लगे हैं ।गुजरात के दलित चीख चीख कर कह रहे हैं कि हमारी जमीन दे दो ।लेकिन प्रशासन को कुछ सुनाई नहीं देता ।
लेकिन गुजरात की नहीं यहाँ म प्र के पन्ना की बात हो रही है ।मुख्यमंत्री वहां बाढ़ में डूबते लोगों को हिम्मत बंधाने गए थे और लोगों ने उनकी संवेदनशीलता को दयनीय दृश्य में बदल दिया ।अब यह आवभगत भी थी तो उसकी भी तो कोई सीमा होती है ।यार आप उन्हें जमीन पर पावँ ही नहीं रखने दे रहे हो ।उर्दू शायरी में मेहमान नवाजी का एक अंदाज यह भी होता है कि मेहमान को पलकों पर बिठा लिया जाता है ।पर राजनीति ने आँखों की यह पाकीजगी छीन ली ।अब पलकों में वह नजाकत कहाँ है ,शायद इसीलिए मुख्यमंत्री को हाथों हाथ लिया गया ।लेकिन सम्मान का यह दृश्य बच्चों की टांगा टोली जैसा लगा ।आदर का अतिरेक भी कभी कभी दुखदायी हो जाता है ।भले ही वह तात्कालिकता में हो ।यह भी हो सकता है कि होमगार्ड वालों को मुख्यमंत्री , 
हाथों में उठाने के लिए मुआफिक लगे हों ।मैं पूछता हूँ इस बाढ़ को देखने यदि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आये होते तब क्या होमगार्ड वाले ऐसी हिम्मत दिखा पाते ।सुना है उनके वजन से तो बिहार की लिफ्ट भी टूट जाती है ।
बहरहाल इस दृश्य को देख कर मुझे हमारे इलाके की डोलग्यारस की याद आ गयी ।उसमे आलकी की पालकी का जयघोष करते हुए लोग भगवान् की डोली को कंधों पर उठा लेते हैं ।तो क्या बाढ़ की आपदा के बीच पन्ना में मुख्यमंत्री की डोल ग्यारस हो रही थी ।जो भी हो वहां किसी ने मुख्यमंत्री के जूते उठाये और उतने से मन नहीं भरा तो समूचे मुख्यमंत्री को उठा लिया ।वहां के कार्यकर्त्ता हाथ मलते रह गए और होमगार्ड वालों ने हाथ मार दिया ।लोग बता रहे हैं कि इस दृश्य ने मुख्यमंत्री की संवेदना की धार को भोंथरी कर दी ।मजा तो तब था कि वे गले गले पानी में उतर जाते ।

"मार्गदर्शक मंडल"

जीवन में मार्गदर्शन की बहुतै जरूरत होती है भाई साब ।काय से कि सही मार्ग होगा तब ही तो चलोगे ।मार्गों के साथ ये दिक्कत है कि वे बहुत सारे होते हैं ।आदमी किस मार्ग पर चले ।चले भी कि एक ही जगह पर खड़ा रहे ।कुछ समझ में नहीं आता यार ,बहुतै कन्फ्यूजन जैसा मचा है ससुरा । इसी कन्फ्यूजन की वजह से कुछ लोग एक ही जगह पर खड़े रहते हैं |और तब तक खड़े रहते हैं जब तक उन्हें इतिहास की झाड़ू कूड़ेदान में न फेंक दे | ये थमें हुए लोग होते हैं | इन्ही लोगन के लिए सुधि जन कहते आ रहे हैं कि एक रास्ता है जिंदगी जो थम गए तो कुछ नहीं
प्रश्न उठता है कि वह कौन सा रास्ता है जिसके बलबूते पर इन रुके हुए लोगों को ठिकाने लगाया जाये |इसका जवाब है मार्गदर्शक मंडल |।राजनीति में मार्गदर्शक मंडल ऐसे ही थोड़े बन गया।उसके पीछे बहुतों का दिमाग़ है ।बल्कि कई तो ऐसे हैं जिनके पास अपना कोई दिमाग नहीं है फिर भी वे मार्गदर्शक मंडल बनाने पर जोर देते रहते हैं । यह सब उम्र का तकाजा है भाई साब | देखिए राजनीति में मार्गों की कोई कमी नहीं होती ।वाममार्ग और दक्षिणपंथ तो खैर पहले से ही घोषित हैं लेकिन इसके अलावा भी ढेरों गली गोचे और पगडंडियां हैं ।जो कंटीली भी हैं और फिसलन भरी भी ।ऐसे में यदि कोई मार्ग बताने वाला न हो तो आदमी तो गया काम से ।इधर जिस पार्टी के पास मार्गदर्शक मंडल होता है उसके मजे हैं ।कोई सा भी मार्ग पकड़ लो कहीं भी निकल लो । भटक गए तो मार्गदर्शक मंडल तो है ही ।जय हो मार्गदर्शक मंडल ।
लेकिन कृपाशंकर जी दूसरी ही कहानी बताते हैं ।वही वाले कृपाशंकर जो अब तक सैकड़ों पार्टियों में रह चुके हैं और कई दलों से निकाले जा चुके हैं तथा फिलहाल उस पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में घुसने को आतुर हैं जो उन्होंने वर्षों पहले टिकिट न मिलने के कारण छोड़ दी थी |।उन्होंने बताया कि मार्गदर्शक मंडल देखा जाये तो श्रद्धेय टाइप के लोगों का एक ऐसा गिरोह होता है जो चलते चलते ठिठक से गए हैं और उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है ।ऐसे लोगों को राजनीति में मार्गदर्शक मंडल में घुसेड़ दिया जाता है ।ये वास्तव में भटके हुए लोग हैं जिनके बताये मार्ग पर कोई भूलकर भी नहीं चलता । इनके हाथ में एक ऐसी टार्च दे दी जाती है जिसकी बैट्री उतार पर होती है जो रौशनी कम देती है और धुंधलका ज्यादा फैलाती है ।
मैंने कहा फिर ये मार्ग दर्शन कैसे करते हैं ।कृपाशंकर जी ने कहा कौनो मार्गदर्शन नहीं करते साब ।एक जगह बैठे बैठे उन मार्गों का दर्शन करते रहते हैं जिन पर चलकर लोग मंत्री पद को प्राप्त करते हैं तथा ये लोक और परलोक दोनों ही सुधार लेते हैं ।यही मार्ग दर्शन कहलाता है ।भारतीय दर्शन में जिसे वानप्रस्थ कहते हैं ना राजनीति में उसे मार्गदर्शक मंडल कहा जाता है ।सच तो यह है कि पार्टी की वर्षगांठ पर मीडिया के सामने इन्हें माला वाला डालकर थोडा भेंट पूजन कर लिया जाता है फिर उसी जगह डाल देते हैं जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझता ।मैंने कहा फिर आप क्यों मार्गदर्शक मंडल में जाना चाहते हैं ।उन्होंने कहा भैया पिचहत्तर पार कर गए अब क्या करें ,इस पापी पेट के लिए कुछ तो करना पड़ेगा |इतना कहकर वे अपना बड़ा सा पेट दिखाने लगे |

"खूँटे पर टिका हुआ लोकतंत्र"

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अब वे पंजाब में खूँटा गाड़ेंगे | पंजाब की जनता में खुशी की लहर जैसी मची है | खुशी इस बात की है कि चलो आप पार्टी का एक खूँटा इधर भी गड रहा है | लेकिन थोडा असमंजस भी है | 
कहीं ये लुधियाने में ही खूँटा गाड़कर वापस न चले जाएँ | चंडीगढ़ और पटियाला वाले आशंकित हैं | क्योंकि पूरा पंजाब उड़ रहा है | सबको स्थायित्व चाहिए | स्थिरता के लिए खूँटा भरोसे की चीज है | केजरीवाल की नजर पूरे पंजाब पर है | केजरीवाल जी खूँटे के मार्फ़त जिस तरह के राजनीतिक दर्शन का मुजाहिरा करना चाहते हैं उसकी गूँज दूर तक जा सकती है | फिर आजकल वे विपश्यना ध्यान भी करने लगे हैं | इस ध्यान के करने से भीतर के द्वंद्व मिटने लगते हैं | द्रष्टि भेद अपने आप समाप्त हो जाता है | ध्यानी के लिए क्या तो भटिंडा और क्या अमृतसर , सब बराबर है | ध्यान में जाने के बाद जालंधर भी वैसा ही लगता है जैसा पठानकोट | पूरा मामला मछली की आंख वाला है | अर्जुन को केवल आँख दिख रही थी केजरीवाल जी पंजाब की विधान सभा देख रहे हैं | केजरीवाल जी के व्यक्तित्व का यह दिलचस्प पहलू है , वे विपश्यना भी करते हैं और वक्त पड़ने पर खूँटा भी गाड़ लेते हैं | कुछ लोगों की मान्यता है कि उन्हें खूँटा गाड़ने की प्रेरणा विपश्यना से ही मिली है | खूँटे और विपश्यना में उन्होंने गहरा अंतर्संबंध ढूंढ निकाला | इसे ही ध्यान की चरम अवस्था कहा जाता है | 
खूँटा गाड़ना राजनीतिक नवाचारों की श्रंखला में प्रगतिगामी कदम है | हलाकि यह अभीतक साफ़ नहीं हुआ कि क्या यह वही खूँटा है जो दिल्ली में गाडा गया था या कोई दूसरा है | यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि आप वालों के पास कितने खूँटे हैं | आप पार्टी के प्रवक्ता से जब इस बाबत पूछा गया तो उनका आग्रह था कि आप लोग खूँटे के शब्दार्थ पर न जाएँ , बल्कि उसके भावार्थ पर गौर करें | हिन्दी में यही परेशानी है | यहाँ आदमी शब्दार्थ और भावार्थ के द्वंद्व से बाहर नहीं निकल पाया | प्रश्न है कि खूँटे का का भावार्थ क्या हो सकता है | लेकिन प्रवक्ता मौन हैं | आप वालों की शिकायत वाजिब हो सकती है | उनकी वे जानें | अपना तो मानना है कि खूँटा अपने शब्दार्थ और भावार्थ दोनों ही स्थितियों में अंततः खूँटा ही रहता है | 
राजनीति में निष्णात तथा अनेक पार्टियों से निकाले गए मेरे मित्र चिन्तक जी ने बताया कि केजरीवाल के खूँटे वाले वक्तव्य में एक प्रकार की दम्भोक्ति है | वे खूँटे गाड़ने वाली बात इतने अहंकार से कह रहे हैं मानो चुनाव से पहले ही पंजाब में झंडा गाड़ दिया हो |देखिये भाई साब झंडे गाड़ने और खूँटे गाड़ने में एक तरह का अर्थ भेद और क्रिया भेद है | झंडा गाड़ने का मतलब जीत का परचम लहराना है | लेकिन खूँटा गाड़ने का अर्थ सामने वाले को चुनौती देना है |यह उसी तरह की चुनौती है जैसे सीता हरण के दौरान अंगद ने रावण के दरबार में दी थी | 
जो मम चरण सकसी सठ टारी / फिरहिं राम सीता मै हारि|
तो भाई साब वे तो अंगद जी थे जिनके सर पर राम जी का हाथ था | आपके केजरीवाल पर किसका हाथ है | मैंने कहा मुझे क्या मालूम| हाथ के बारे में मेरी राजनीतिक समझ कुल मिलाकर इतनी है कि वह कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है | 
चिन्तक जी ने कहा- तो फिर सुन लीजिये पंजाब में और लोग भी हैं जो खूँटे गाड़ने को लालायित बैठे हैं अव्वल तो जो बादल वहां पहले से खूँटा गाड़े बैठे हैं उन्हें आप रूई के गोले समझते हैं क्या | देखिये लोकतंत्र में खूँटा गाड़ने की स्वतंत्रता हर एक का संवैधानिक अधिकार है | समझे कि नहीं समझे |
मै चिन्तक जी की बात पूरी तरह समझ गया था | मुझे खूँटा गाड़ने के साथ खूँटा उखाड़ने वाले लोग भी दिखाई देने लगे | कुछ लोग अपने जीवन में भले ही एक भी खूँटा न गाड़ पायें लेकिन खूँटा उखाड़ने की कला में पारंगत होते हैं | ये खूँटा उखाडू कहलाते हैं | खूँटा उखाडू लोग खूँटे की उपादेयता को कई तरह से प्रयोग में लाते हैं | ये खूँटे को ठोकने में भी यकीन रखते हैं | इनका मानना है कि खूँटे को युक्ति पूर्वक सही जगह पर ठोंक दिया जाये तो सामने वाले की आसानी से मट्टी पलीद की जा सकती है | 
राजनीति में खूँटा गाड़ने ओर उखाड़ने की परम्परा आदिकाल से जारी है | मुझे तो इस दुनिया में दो ही तरह के लोग दिखाई देते हैं | एक वे जो खूँटा गाड़ते हैं और दुसरे वे जो उसे उखाड़ते हैं | होने को तीसरी तरह के भी होते हैं पर वे गाय और बकरी की तरह होते हैं जिनके गले में रस्सी बांध कर इन्ही खूंटो के हवाले किया जाता है | इन दिनों यही हो रहा है |
खूंटो की राजनीति से दूर एक प्यारी सी चीज होती है जो घर की दीवाल में गडी होती है | यह खूंटी कहलाती है | इस पर आप कमीज पतलून से लेकर झोला झंडा जो चाहे टांग सकते हैं | खूंटी को सब स्वीकार्य है | लोग तो खूंटी पर अपने अंडरगारमेंट्स भी टांग देते हैं | खूंटी आपको कपड़ों के वजन से मुक्त करती है | भारमुक्त होने का यह आनन्द अद्वितीय है | मुक्ति केवल ज्ञान से ही नहीं मिलती खूंटी से भी मिलती है | ह्म जैसे साधकों का यही फर्ज है कि अपने कपडे किसी खूंटी पर टांगकर मुक्ति का सुख हासिल करें | खूंटो की राजनीति केजरीवाल को मुबारक हो |

"देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है"

पता नहीं कैसे इस जिंगल अथवा थीम सांग को लेकर उनमे बहस शुरू हुई |जबकि वे प्राय: बहस नहीं करते | बंधी बंधाई नौकरी करते हैं और घर चले जाते हैं | बहस यदि हुई भी तो पिटे पिटाए विषयों पर होती है | जैसे पेट्रोल के दाम पर या इस बात पर कि हम सब्सिडी क्यों छोड़ें | कभी कभी दबे छुपे ढंग से बॉस की चेक वाली शर्ट पर | बहुत हुआ तो दफ्तर की मर्यादा का ध्यान रखते हुए आटे में नमक जितनी छेड़ छाड़ हो जाती है | 
आज बहस इस रिंगटोन पर मच गयी | हुआ यों कि अचानक लंच में किसी के मोबाइल पर तेजी से यह जिंगल बज उठा “ मेरा देश बदल रहा है आगे बढ़ रहा है ‘ इसे सुनकर बड़े बाबू ने मजाक करते हुए कहा कि देश बदलना और आगे बढ़ना एक साथ नहीं हो सकता बन्धु | देश बदल रहा है तो जरूरी नहीं कि वह आगे ही बढे , पीछे भी लौट सकता है | यह तकनीकी रूप से भी मुश्किल है | मान लो कोई आदमी कपडे बदल रहा है तो वह आगे कैसे बढेगा , एक ही जगह खड़ा होकर नहीं बदलेगा ? हाँ कपडे बदलने के बाद जरूर आगे बढ़ सकता है | इस कुतर्क अथवा लफ्फाजी पर सब हँस दिये | बड़ा बाबु मजाक करे तो सबको हँसना चाहिए | दफ्तर का यही दस्तूर है | बॉस की बीबी बीमार पड़ जाये तो पूरा ऑफिस अधमरा हो जाता है | 
दफ्तर में लंच चल रहा है | लंच के बाद पान खाने की परम्परा है | कार्यालय से सौ मीटर की दूरी तक पान की गुमटी और ठेले आदि लगाने के लिए साहब ने मना कर रखा है | लेकिन इस कानून का उल्लंघन करते हुए एक गुमटी वहां स्थाई रूप से ठोंकी जा चुकी है , जहाँ पान गुटखे और चाय आदि मिलते हैं | जिस आदमी ने यह गुमटी ठोंकी है वह बड़े बाबु का रिश्तेदार है | बड़े बाबु को परिवार वालों ने कहा कि तुम बड़े बाबु हो गए हो तो इस महेश को भी कहीं चिपका दो | घर वालों को पता नहीं है कि चिपकाना अब इतना आसान नहीं रहा | बड़े बाबु को चिपकाने के स्थानापन्न के रूप में ये गुमटी सूझ गयी | वे महेश को चिपका तो नहीं सके पर यहाँ उसकी गुमटी जरूर ठुंकवा दी | जिस स्थान पर यह गुमटी स्थापित है वहां ठीक से खड़े होने की भी जगह नहीं है | जाहिर है कि वह अतिक्रमण के अंतर्गत स्थापित है | लेकिन पुलिसे वाले और पानवाले के बीच एक अनुबंध जैसा है जिसके तहत एक डबल मलाई वाली चाय और दो जाफरानी वाले पान उसे नियमित देने होते हैं | यह अनुबंध वर्षों से जारी है | 
देश बदलने वाली बहस दफ्तर से शुरू हुई और होते होते इस गुमटी तक चली आई | बड़े बाबु के साथ उनके दो मातहत भी हैं जो पान खाने और चापलूसी करने के शौकीन है | खाली वक्त में चूँकि बड़े बाबु को विद्वता के झटके या फिट आते हैं , उसे भरने के लिए उन्होंने इस बहस को गरमाए रखना जरूरी समझा | 
क्यों गुप्ता क्या कहते हो देश सचमुच बदल रहा है या ससुरा नाटक ही चल रहा है ? ऐसे मामलों में गुप्ता जी प्राय: तटस्थ ही रहते हैं | गुप्ता ने रेडीमेड जवाब दिया – हमको क्या करना है देश बदले न बदले अपनी दाल रोटी चलती रहनी चाहिए | बड़े बाबु को गुप्ता की यही आदत पसंद नही है | मुद्दे की बात पर खुलकर नहीं बोलता | राजनीती करता है | दाल दो सौ रूपये किलो हो गयी ऐसे में तुम्हारी दालरोटी कैसे चलेगी ? देश बदल रहा है या रोज दाल के भाव बदल रहे हैं | बड़े बाबु ने गुप्ता को घुड़क दिया | लेकिन परांजपे ने बड़े बाबु की हाँ में हाँ नहीं मिलाई | उसने कहा कि मुझे तो लगता है बदल रहा है , क्योंकि मेरे घर के सामने वाली गली में अभी अभी सीमेंट के सफ़ेद ब्लाक लग गए और नाली भी बन गयी | एप्रोच रोड इतना झकास हो गया है कि उस पर चलो तो ऐसा लगता है मानो शहजादा सलीम संगमरमर पर चल रहा हो | सब लोग हंस पड़े | परांजपे ने देश बदलने की मुहिम को एकदम गली में घुसेड दिया |
अब तक गुमटी के निकट लोगों का एक छोटा सा जत्था जमा हो गया था | ये सब अपनी हैसियत के मुताबिक अचानक देश बदलने वाली बहस में भागीदार हो चुके थे | हालाकि उनका असली मकसद देश बदलना नहीं था वे वास्तव में छाता विहीन लोग थे जो बारिश से बचने के लिये गुमटी के पास रुक गए थे | जत्थे में शामिल एक नामालूम से शख्स ने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि देश का तो मुझे नहीं मालूम पर पिछले दिनों एक गाँव के बदलने का जोरदार वाकिया सामने आया | हुआ यूँ कि मनरेगा के अंतर्गत चलने वाली कपिल धारा योजना के तहत कथित गाँव में लगभग दो सौ उनतालीस कूंए खोद दिए गये | ऐसा अखबार में छपा | जबकि गाँव इतना छोटा और मासूम सा है कि वहां इतने कूंए खुद जाए तो न तो खेतों में फसल बोने की जगह बचे और न गाँव में चलने फिरने के रास्ते बचें | तो भैया कहने का तात्पर्य ये कि देश भले ही बदल रहा हो पर इतना भी नहीं बदल रहा है कि सौ सवा सौ लोगों की बस्ती में दो सौ से ऊपर कुंए खुद जाए | इस बात को सुनकर पान वाला कत्थे की डंडी पकडे देर तक खामोश बैठा रहा |

“मकई के दानों से आर्थिक महाशक्ति बनता देश”


मुझे उस मॉल के भीतर नहीं जाना है यह मैं मन ही मन तय कर चुका था | बाहर खुली हवा और साफ़ आसमान था | मॉल के परिसर में चमकती कारों की सतत आवाजाही हो रही थी, जिन्हें पार्किंग के लिए नियुक्त गार्ड सीटी बजाकर नियन्त्रित कर रहा था | श्रीमती जी को बिटिया के लिए सलवार सूट लेना था लेकिन सलवार सूट बहाना था असली बात यह थी कि मॉल में आज फिफ्टी परसेंट की छूट की घोषणा हुई थी | इस छूट को लोग लूट समझ रहे थे, इसलिए भीड़-भाड़ थी | भीड़ को चीरती हुई भीड़ | क्या भूलूं क्या याद करूं की तर्ज पर क्या खरीदूं क्या छोडू जैसा माहौल | मै प्रवेश द्वार तक गया और एस्केलेटर का डंडा पकड़कर रुक गया | मैंने पत्नी से कहा कि मै यहीं रुकता हूँ | मुझे सलवार सूट की वैसे भी परख नहीं है | पत्नी ने ताना दिया कि – तुम्हे कई चीजों की परख नहीं है | मै मॉल के मुहाने पर हुज्जत नहीं करना चाहता था | इस काम के लिए घर में ढेर सारा वक्त मिलता है, इसलिए खामोश रहा | वह दृढ़ता से ऊपर चली गयी और मै बेशरमी से नीचे उतर आया | नीचे बहुत रौशनी थी | उजाले का अतिरेक जैसा |मै जब भी इतने भव्य उजाले को देखता हूँ मुझे अक्सर अपना गाँव याद आ जाता है , जहाँ रात भर अँधेरा अपने जबड़े फैलाए रहता है |
वहां बिजली के खम्भे भर लगे हैं रौशनी नहीं है | विधायक का कहना है कि ठेकेदार इस बार भी पैसे खा गया लिहाजा अगले चुनाव तक घासलेट से जलने वाली कंदीलों से ही काम चलाना पड़ेगा | सोचता हूँ इस नियोन बत्ती वाले खम्भे को उखाड़कर गाँव की चौपाल पर लगा दूं , पर सोचने से क्या होता है | मॉल में रंगीन बत्तियों से चमकती दूकानों के अलावा छोटे छोटे झिलमिल करते फव्वारे और कई तरह की खुशबुओं से सरसराती हवा बह रही थी | लकदक सौन्दर्य की अनुपम छटा | बाजार का भी अपना एक सौन्दर्य होता है | तुलसी ने कहा है – “ ध्वज पताक पट चामर चारु / छापा परम विचित्र बाजारू | मानस में जिस बाजार का वर्णन है यहाँ का बाजार उससे इक्कीस ही रहा होगा | मॉल के बाहर एक मक्का का स्टाल देख कर मैं उधर चला गया | मक्का की दूकान की सजावट भी रमणीय थी | इच्छा तो सिगड़ी में सिंके हुए भुट्टे खाने की हो रही थी लेकिन इस साफ़ सुथरे और रौशनी से आतंकित करने वाले परिसर में धुंए वाली सिगड़ी की कल्पना करना अधम और नारकीय विचार है | अतः सिगड़ी में सिंके भुट्टे खाने की इच्छा को विलोपित करते हुए मैंने मक्का से मन बहलाने का निर्णय लिया | पत्नी यदि मॉल में घुस जाये तो टाइम पास के लिए मक्का और मुमफली के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता |मैंने मक्का चुनी | वह उबली हुई मक्का थी पर मक्के वाला बता रहा था कि वह अमरीकन कॉर्न है | मैंने अपने स्वदेशी वाले स्वाभिमान को जाग्रत करते हुए कहा मक्का तो अपने यहाँ भी खूब होती है | वह मेरी तरफ हिकारत से देखने लगा | मैंने कहा एक प्लेट दे दो | ठेठ देशी लहजे में मक्का मांगने पर वह कुछ आहत सा हुआ , मानो उसके व्यावसायिक आभिजात्य पर चोट पहुँची हो | उसने कहा मक्का नहीं अमरीकन कॉर्न प्लेट्स बोलिए सर , वह दूकान के साइनबोर्ड की तरफ देखते हुए बोला | मैंने कहा हाँ वही | उसने एक कागज के कप में थोड़े से मक्का के दाने दे दिए | मक्का स्वादिष्ट थी | मैंने कहा कितने हुए , उसने कहा सिक्सटी ! मै हतप्रभ हुआ फिर हतप्रभ न होने का अभिनय करते हुए साठ रूपये निकालकर दे दिए | लेकिन मन नहीं माना | मैंने कहा सुनो इन पच्चीस तीस मकई के दानों के साठ रूपये वसूलते हुए तुम्हे अजीब नहीं लगता | तुम इसी देश बल्कि आसपास के किसी गाँव के रहने वाले हो और अच्छी तरह जानते हो कि इतनी मकई की कीमत मुश्किल से दो रूपये भी नहीं है | वह बोला जानता हूँ सर ! लेकिन देखिये एक तो इस जगह की कीमत | फिर ये इन्डक्शन चूल्हा, जिस पर कॉर्न उबाली जाती है, फिर ये पेपर कप जो सेमी आटोमेटिक डबल डाई माइक्रो कंट्रोलर बेस्ड मशीन पर बने हैं | फिर यह नियोंन रोशनी | देखिये ग्लोब्लैजेशन ने मक्का को कहाँ पहुंचा दिया | मैं उससे यह भी पूछना चाहता था कि हमारे देश के मक्का उगाने वाले भी कहीं पहुंचे कि नहीं ? लेकिन खामोश रहा | बाजार के इस इंद्रजालिक सम्मोहन में उलझे बगैर मैंने सोचा देश को इकानामिक सुपर पावर बनाने में यदि दो रूपये की मक्का के साठ रूपये देने पड़े तो एक नागरिक के तौर पर मुझे ज्यादा हीला हवाला नहीं करना चाहिए|